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सच की बात है

मनरेगा को और शक्ति देकर बनाया गया प्रभावशाली “विकसित भारत-जी राम जी 2025”

Bychattisgarhmint.com

Jan 10, 2026

विकसित भारत- जी राम जी विधेयक 2025 विकसित भारत 2047 के साथ संयोजित एक नई सांविधिक संरचना के साथ मनरेगा का स्थान लिया है।रोजगार गारंटी को प्रति ग्रामीण परिवार बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है, जिससे आय सुरक्षा सुदृढ़ होगी। चार प्राथमिकता क्षेत्रों में टिकाऊ ग्रामीण अवसंरचना के साथ मजदूरी रोजगार को जोड़ता है। विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक के माध्यम से राष्ट्रीय रूप से एकीकृत और विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं के माध्यम से विकेंद्रित योजना विनिर्माण को सुदृढ़ करता है। मानंदड़ संबंधी वित्त पोषण और केंद्रीय रूप से प्रायोजित संरचना की ओर बदलाव पूर्वानुमान, जवाबदेही और केंद्र-राज्य साझीदारी में सुधार लाता है।

ग्रामीण रोज़गार लगभग दो दशकों से भारत की सामाजिक सुरक्षा संरचना की आधारशिला रही है। 2005 में कार्यान्वित होने के बाद से, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ने मज़दूरी वाला रोजगार प्रदान करने, ग्रामीण आय को स्थिर करने और मूलभूत अवसंरचना निर्माण में अहम भूमिका निभाई है। हालांकि, समय के साथ, ग्रामीण भारत की संरचना और लक्ष्य अत्‍यधिक बदल गए हैं। बढ़ती आय, बढ़ी हुई कनेक्टिविटी, व्यापक स्तर पर डिजिटल पहुंच और अलग-अलग तरह की आजीविका ने ग्रामीण रोज़गार की आवश्यकताओं की प्रकृति बदल दी है।
इस पृष्ठभूमि में, सरकार ने विकसित भारत-रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025, जिसे विकसित भारत- जी राम जी विधेयक, 2025 भी कहा जाता है, का प्रस्ताव रखा। यह विधेयक मनरेगा में व्यापक वैधानिक बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है, जो ग्रामीण रोज़गार को विकसित भारत 2047 के दीर्घकालिक विजन के साथ संयोजित करता है तथा जवाबदेही, बुनियादी ढांचे के परिणामों और आय सुरक्षा को सुदृढ़ करता है।

भारत में ग्रामीण रोजगार और विकास नीति की पृष्ठभूमि

स्वतंत्रता के बाद से, भारत में ग्रामीण विकास की नीतियों का केंद्रबिन्दु निर्धनता कम करने, खेती की पैदावार को बेहतर बनाने और अधिशेष तथा कम काम वाले ग्रामीण मज़दूरों के लिए रोजगार सृजन रहा है। मजदूरी वाले रोजगार कार्यक्रम धीरे-धीरे ग्रामीण रोजगार की सहायता करने के मुख्य माध्यम बन गए हैं, साथ ही इसने मूलभूत अवसंरचना को भी सुदृढ़ किया है। समय के साथ बदलते सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के अनुरूप दृष्टिकोणों में भी बदलाव आया है।

ग्रामीण श्रमबल कार्यक्रम (1960 का दशक) और ग्रामीण रोजगार के लिए क्रैश स्कीम (1971) जैसे आरम्भिक कार्यक्रमों के साथभारत के मजदूरी रोजगार पहलों की विविध चरणों के माध्यम से प्रगति हुई। इनके बाद 1980 और 1990 के दशक में अधिक संरचित प्रयास किए गए, जिसमें राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम शामिल था, जिसे बाद में जवाहर रोजगार योजना (1993) में विलय कर दिया गया। 1999 में यह सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना में संघटित हो गई, जिसका उद्देश्य कवरेज और समन्वय में सुधार करना था। रोजगार आश्वासन योजना और काम के बदले अनाज कार्यक्रम जैसी पूरक योजनाओं ने मौसमी बेरोजगारी और खाद्य सुरक्षा पर ध्यान दिया। 1977 के महाराष्ट्र रोजगार गारंटी अधिनियम के साथ एक बड़ा बदलाव आया, जिसने काम करने के वैधानिक अधिकार की अवधारणा प्रस्तुत की। इन अनुभवों की परिणति 2005 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के अधिनियमन में हुई।

मनरेगा का विकास और वृद्धिशील सुधार की सीमाएं

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) एक प्रमुख कार्यक्रम था जिसका लक्ष्य बिना कौशल वाले काम करने को तैयार गांव के परिवारों को प्रति वर्ष कम से कम 100 दिन की गारंटी वाला काम देकर रोजी-रोटी की सुरक्षा बढ़ाना था। पिछले कुछ वर्षों में, कई प्रशासनिक और प्राद्यौगिक सुधारों ने इसके कार्यान्वयन को सुदृढ़ किया, जिससे सहभागिता, पारदर्शिता और डिजिटल शासन में अत्‍यधिक सुधार हुआ। वित्‍त वर्ष 2013-14 और वित्‍त वर्ष 2025-26 के बीच महिलाओं की सहभागिता 48 प्रतिशत से धीरे-धीरे बढ़कर 58.15 प्रतिशत हो गई, आधार सीडिंग में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई, आधार-बेस्ड पेमेंट सिस्टम को व्‍यापक स्‍तर पर अपनाया गया और इलेक्ट्रॉनिक वेतन पेमेंट लगभग हर जगह प्रचलित हो गया। कामों की निगरानी में भी सुधार हुआ, जियो-टैग्ड एसेट्स में व्‍यापक स्‍तर पर बढ़ोतरी हुई और घरेलू स्‍तर पर सृजित अलग-अलग परिसंपत्तियों का हिस्सा बढ़ा।

मनरेगा के तहत प्राप्‍त अनुभव ने प्रक्षेत्र-स्‍तरीय कर्मचारियों की अहम भूमिका को भी रेखांकित किया, जिन्होंने कम प्रशासनिक संसाधनों और कर्मचारियों के साथ काम करने के बावजूद निरंतरता और कर्यान्‍वयन का परिमाण सुनिश्चित किया। यद्पि, इन लाभों के साथ-साथ, गहरे संरचनागत मुद्दे भी बने ही रहे। कई राज्यों में निगरानी से पता चला कि जमीनी स्‍तर पर काम प्राप्‍त नहीं हो रहा था, व्‍यय वास्‍तविक प्रगति से मेल नहीं खा रहा था, श्रम केन्द्रित कार्यों में मशीनों का इस्तेमाल हो रहा था और डिजिटल उपस्थितिप्रणाली का बार-बार उल्‍लंघन किया जा रहा था। समय के साथ, गलत इस्तेमाल बढ़ता गया और महामारी के बाद के समय में केवल कुछ ही परिवार पूरे सौ दिन का काम पूरा कर पाए। इन रुझानों से पता चला कि डिलीवरी प्रणाली में तो सुधार हुआ, लेकिन मनरेगा का पूरा ढांचा लगभग चरमरा चुका था।

रोजगार के लिए विकसित भारत गारंटी और आजीविका मिशन ग्रामीण विधेयक ने एक व्‍यापक कानूनी बदलाव के जरिए इस अनुभव पर ध्‍यान दिया है। यह प्रशासनिक व्‍यय की सीमा को 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 9 प्रतिशत करने के जरिए कार्यान्‍वयन संरचना को सुदृढ़ करता है, जिससे कर्मचारियों की भर्ती करने, पारिश्रमिक प्रदान करने, प्रशिक्षण और तकनीकी क्षमता के लिए पर्याप्‍त मदद मिलती है। यह बदलाव प्रोग्राम मैनेजमेंट के लिए एक व्‍यावहारिक और लोक-केंद्रित दृष्टिकोण प्रदर्शित करता है, जो अधिक पेशेवर और उपयुक्‍त सपोर्ट वाले सिस्टम की ओर बढ़ रहा है। मजबूत प्रशासनिक क्षमता से योजना निर्माण और काम करने में सुधार, सेवा वितरण में बढ़ोतरी और जवाबदेही में सुदृढ़ता आने की उम्‍मीद है, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि नई संरचना के लक्ष्य ग्रामीण स्‍तर पर निरंतर पूरे होते रहें।

नए वैधानिक ढांचे का औचित्‍य

सुधार की आवश्‍यकता बड़े सामाजिक-आर्थिक बदलावों में भी निहित है। मनरेगा 2005 में कार्यान्वित किया गया था, लेकिन ग्रामीण भारत अब रूपांतरित हो रहा है। 2011-12 में निर्धनता का स्‍तर 27.1 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 5.3 प्रतिशत हो गया, जिसे बढ़ते उपभोग, बेहतर वित्‍तीय सुविधा और बढ़े हुए कल्‍याणकारी कवरेज से सहायता मिली। ग्रामीण आजीविका के अधिक विविधीकृत होने और डिजिटली तरीके से समेकित होने के साथ, मनरेगा की व्‍यापक और मांग आधारित संरचना अब आज के गांव की वास्‍तविकता से पूरी तरह मेल नहीं खाती। विकसित भारत- जी राम जी , इस संदर्भ का प्रत्‍युत्‍तर ग्रामीण रोजगार गारंटी को आधुनिक बनाने, जवाबदेही को सुदृढ़ करने और रोजगार सृजन को दीर्घावधि अवसंरचना और जलवायु अनुकूलता लक्ष्यों के साथ जोड़कर देता है।

विकसित भारत-जी राम जी 2025 की मुख्य विशेषताएं

यह प्रत्‍येक वित्‍तीय वर्ष में ऐसे ग्रामीण परिवारों को, जिनके वयस्‍क सदस्‍य स्‍वेच्‍छा से बिना कौशल वाले काम के लिए तैयार हैं, 125 दिन की मजदूरी वाले रोजगार की गारंटी देता है। इससे पहले के 100 दिन की पात्रता से अधिक दिनों की आय सुरक्षा में मदद मिलेगी। साथ ही, बुवाई और कटाई के व्‍यस्‍त सीज़न में खेती में काम करने वाले मजदूरों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए कुल 60 दिन का नो-वर्क पीरियड होगा। शेष 305 दिनों में भी मजदूरों को 125 दिन की गारंटी वाला रोजगार प्राप्‍त होता रहेगा, जिससे किसानों और मजदूरों दोनों लाभान्वित होंगे। दैनिक मज़दूरी हर सप्‍ताह या किसी भी स्थिति में, काम करने की तिथि के 15 दिन के भीतर ही वितरित कर दी जाएगी। रोजगार सृजन को चार प्राथमिकता वाले कार्य-क्षेत्रों के माध्‍यम से अवसंरचना विकास के साथ जोड़ा गया है।

जल-संबंधी कार्यों के माध्यम से जल सुरक्षा, मुख्य-ग्रामीण अवसंरचना, आजीविका से संबंधित बुनियादी ढांचा, मौसम में बदलाव के असर को कम करने के लिए विशेष कार्य, सृजित सभी परिसंपत्तियों को विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना से जोड़ा गया है, जो एक एकीकृत और समन्वित राष्ट्रीय विकास रणनीति सुनिश्चित करता है। योजना को विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं के जरिए विकेंद्रीकृत किया जाता है, जो स्थानीय रूप से तैयार की जाती हैं और स्थानीय रूप से पीएम गति शक्ति जैसी राष्ट्रीय प्रणालियों के साथ एकीकृत होती हैं।

मनरेगा बनाम विकसित भारत- जी राम जी विधेयक, 2025
नया विधेयक मनरेगा में एक बड़े सुधार का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें रोजगार, पारदर्शिता, योजना और जवाबदेही को बढ़ाते हुए संरचनात्मक कमियों को दुरूस्त किया गया है।

वित्तीय ढांचा

केंद्रीय क्षेत्र की योजना से केंद्र प्रायोजित ढांचे में बदलाव ग्रामीण रोजगार और परिसंपत्ति निर्माण की स्वाभाविक रूप से स्थानीय प्रकृति को दर्शाता है। नए बदलाव के तहत, राज्य एक मानक आवंटन ढांचे के माध्यम से लागत और जिम्मेदारी दोनों साझा करते हैं, प्रभावी कार्यान्वयन के लिए प्रोत्साहित करते हैं और दुरुपयोग को रोकते हैं। योजना को क्षेत्रीय जरूरतों के आधार पर तैयार किया जाता है जो ग्राम पंचायत योजनाओं के रूप में दिखता है। साथ ही, केंद्र मानक निर्धारित करता है, जबकि राज्य जवाबदेही के साथ कार्य निष्पादन करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप एक सहकारी साझेदारी होती है जिससे दक्षता में सुधार होता है और ठोस परिणाम मिलते हैं।

मजदूरी, सामग्री और प्रशासनिक खर्चों पर निधियों की कुल अनुमानित वार्षिक आवश्यकता 1,51,282 करोड़ रुपये है, जिसमें राज्य का हिस्सा भी शामिल है। इसमें से केंद्र का अनुमानित हिस्सा 95,692.31 करोड़ रुपये है। इस बदलाव से राज्यों पर कोई अनुचित वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा। वित्त पोषण अवसंरचना को राज्य की क्षमता के अनुसार तैयार किया गया है। इसके तहत केंद्र और राज्यों के बीच 60:40 के मानक लागत-साझाकरण अनुपात, पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए 90:10 की बढ़ी राशि और बिना विधायिका वाले केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 100 प्रतिशत केंद्रीय वित्त पोषण का प्रावधान है। राज्य पहले के ढांचे के तहत, पहले से ही सामग्री और प्रशासनिक लागतों का एक हिस्सा वहन कर रहे थे और पूर्वानुमानित मानक आवंटन के लिए किए गए उपाय से बजट में मजबूती आई है। आपदाओं के दौरान राज्यों को अतिरिक्त सहायता के प्रावधान और मजबूत निगरानी तंत्र भी दुरुपयोग से उत्पन्न होने वाले दीर्घकालिक नुकसान को कम करने में मदद करते हैं और जवाबदेही के साथ-साथ राजकोषीय स्थिरता को मजबूत करते हैं।

यह रोजगार सृजन को उत्पादक परिसंपत्ति सृजन से जोड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है, जिससे घरेलू आय में वृद्धि होती है और अनुकूलन क्षमता में सुधार होता है। पानी से जुड़े कामों, कृषि और भूजल स्तर में सुधार को प्राथमिकता दी जाती है। सड़क और कनेक्टिविटी जैसे मुख्य ग्रामीण बुनियादी ढांचे में निवेश से बाजार तक पहुंच में आसानी होती है, जबकि भंडारण, बाजार और उत्पादन परिसंपत्तियों सहित आजीविका बुनियादी ढांचा आय विविधीकरण को सक्षम बनाता है। जल संचयन, बाढ़ जल निकासी और मृदा संरक्षण पर केंद्रित कार्यों के माध्यम से जलवायु अनुकूलता मजबूत होती है। 125 दिनों के रोजगार की गारंटी घरेलू आय को बढ़ाती है, ग्राम-स्तर की खपत को प्रोत्साहित करती है, और डिजिटल उपस्थिति, मजदूरी भुगतान और डेटा-संचालित योजना के माध्यम से प्रवासन को कम करने में मदद करती है।

किसानों को बुवाई और कटाई के मौसम के दौरान सार्वजनिक कार्यों में राज्य-अधिसूचित ठहराव, मजदूरी मुद्रास्फीति की रोकथाम और बेहतर सिंचाई, भंडारण और कनेक्टिविटी की वजह से सुनिश्चित श्रम उपलब्धता से लाभ होता है। श्रमिकों को उच्च संभावित कमाई, विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं के माध्यम से अनुमानित काम, सुरक्षित डिजिटल मजदूरी भुगतान और उन परिसंपत्तियों से प्रत्यक्ष लाभ होता है जिन्हें सृजित करने में वे मदद करते हैं। इसके साथ ही उन्हें एक अनिवार्य बेरोजगारी भत्ता भी मिलता है। जब श्रमिकों को काम प्रदान नहीं किया जाता है तो उन्हें दैनिक बेरोजगारी भत्ता 15 दिनों के बाद मिल जाता है। इसकी जिम्मेदारी राज्यों को दी गई है। मजदूरी की दरों और शर्तों को नियमों के माध्यम से निर्धारित किया जाना है, जो यह सुनिश्चित करे कि इसमें लचीलापन हो और साथ ही श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा तथा रोजगार के समयबद्ध प्रावधान को बढ़ावा मिले।

कार्यान्वयन और निगरानी प्राधिकरण

यह विधेयक राष्ट्रीय, राज्य, जिला, ब्लॉक और गांव के स्तर पर मिशन को समन्वित, जवाबदेह और पारदर्शी तरीके से लागू करने के लिए एक स्पष्ट संस्थागत ढांचा बनाता है।
केन्द्रीय और राज्य ग्रामीण रोजगार गारंटी परिषदें नीतिगत मार्गदर्शन देती हैं, कार्यान्वयन की समीक्षा करती हैं और जवाबदेही को मजबूत करती हैं।
 राष्ट्रीय और राज्य संचालन समितियां रणनीतिक दिशा, तालमेल और निष्पादन समीक्षा का संचालन करती हैं। पंचायती राज संस्थाएं योजना निर्माण और कार्यान्वयन का नेतृत्व करती हैं, जिसमें ग्राम पंचायतें लागत के हिसाब से कम से कम आधा कार्यान्वयन करती हैं। जिला कार्यक्रम समन्वयक और कार्यक्रम अधिकारी योजना निर्माण, अनुपालन, भुगतान और सामाजिक लेखा-परीक्षा का प्रबंधन करते हैं। ग्राम सभाएं सामाजिक लेखा-परीक्षा करने और सभी रिकॉर्ड तक पहुंच के जरिए पारदर्शिता सुनिश्चित करने में एक मजबूत भूमिका निभाती हैं।

पारदर्शिता, जवाबदेही और सामाजिक सुरक्षा

यह विधेयक अनुपालन सुनिश्चित करने और सार्वजनिक धन की सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार को स्पष्ट प्रवर्तन शक्तियों से लैस करता है। यह केंद्र को कार्यान्वयन से संबंधित शिकायतों की जांच करने, गंभीर अनियमितताओं का पता चलने वाली निधि जारी करने को निलंबित करने और कमियों को दूर करने के लिए सुधारात्मक या उपचारात्मक उपायों को निर्देशित करने के लिए अधिकृत करता है। ये प्रावधान पूरे सिस्टम में जवाबदेही को मजबूत करते हैं, वित्तीय अनुशासन बनाए रखते हैं और दुरुपयोग को रोकने के लिए समय पर हस्तक्षेप करने में सक्षम बनाते हैं।

विधेयक कार्यान्वयन के हर चरण को कवर करते हुए एक व्यापक पारदर्शिता का ढांचा भी स्थापित करता है। यह अनियमितताओं की शीघ्र पहचान करने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण के इस्तेमाल को सक्षम बनाता है, जो निरंतर मार्गदर्शन और समन्वय प्रदान करने वाली केंद्रीय और राज्य संचालन समितियों द्वारा समर्थित है। चार स्पष्ट रूप से परिभाषित ग्रामीण विकास कार्यक्षेत्रों के माध्यम से एक केंद्रित दृष्टिकोण इनके परिणामों की बारीकी से ट्रैकिंग की अनुमति देता है। पंचायतों को पर्यवेक्षण में एक बढ़ी हुई भूमिका सौंपी गई है, जिसमें तत्क्षण कार्यों की जीपीएस और मोबाइल-आधारित निगरानी शामिल है। तत्क्षण एमआईएस डैशबोर्ड और साप्ताहिक सार्वजनिक घोषणा सार्वजनिक दृश्यता सुनिश्चित करते हैं, जबकि हर छह महीने में कम से कम एक बार अनिवार्य सामाजिक लेखा-परीक्षा सामुदायिक भागीदारी और विश्वास को मजबूत करते हैं।

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